अर्ज़ी / ARZI

आज कोई गीत या कोई कविता नहीं,
आज सिर्फ एक अर्ज़ी लिख रहा हूँ ,
मन मर्ज़ी से जीने की मन की मर्ज़ी लिख रहा हूँ ।
आज कोई ख्वाब , कोई हसरत या कोई इल्तिजा नहीं ,
आज बस इस खुदी की खुद-गर्ज़ी लिख रहा हूँ , 
मन मर्ज़ी से जीने की मन की मर्ज़ी लिख रहा हूँ । 

कि अब तक जो लिख-लिख कर पन्ने काले किये ,
कितने लफ्ज़ कितने हर्फ़ इस ज़ुबान के हवाले किये ,
कि कितने किस्से इस दुनिआ के कागज़ों पर जड़ दिए ,
कितने लावारिस किरदारों को कहानियों के घर दिए ,
खोलकर देखी जो दिल की किताब तो एहसास हुआ कि
अब तक  जो भी लिख रहा हूँ सब फ़र्ज़ी लिख रहा हूँ।
लेकिन आज कोई दिल बहलाने वाली झूठी उम्मीद नहीं ,
आज बस इन साँसों में सहकती हर्ज़ी लिख रहा हूँ ,
मन मर्ज़ी से जीने की मन की मर्ज़ी लिख रहा हूँ ।

कि आवारा पंछी हूँ एक , उड़ना चाहता हूँ ऊँचे पहाड़ों में ,
नरगिस का फूल हूँ एक , खिलना चाहता हूँ सब बहारों में ,
कि बेबाक आवाज़ हूँ एक, गूँजना चाहता हूँ खुले आसमान पे ,
आज़ाद अलफ़ाज़ हूँ एक, गुनगुनाना चाहता हूँ हर ज़ुबान पे ,
खो जाना चाहता हूँ इस हवा में बन के एक गीत ,
बस आज उसी की साज़-ओ-तर्ज़ी लिख रहा हूँ।
जो चुप-चाप से बह्ते रहे इन आँखों से आज तक ,
उन अश्कों के बादलों में तूफ़ान सी गर्ज़ी लिख रहा हूँ ,
मन मर्ज़ी से जीने की मन की मर्ज़ी लिख रहा हूँ ।
आज सिर्फ मन मर्ज़ी से जीने की मन की मर्ज़ी लिख रहा हूँ ।।

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