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Saturday, 30 November 2019

PRIYANKA REDDY


सिर्फ नाम बदलता है चेहरा बदलता है
ज़ुल्म तो वही है पाप तो वही है
तकलीफ़ तो वही है मौत तो वही है

सिर्फ एक दो दिन की बातें
या फिर एक दो न-गुज़र सी रातें

फिर भूल जायेंगे हम
जब तक कोई और ना बन जाये
नई निर्भया नई आसिफा या फिर प्रियंका रेड्डी

क्या उम्र क़ैद क्या फांसी की सज़ा
बस एक बार देदो जो ज़ुल्म वही सज़ा

करो बालात्कार उनका भी
बना कर टीवी पर चलादो MMS उनका

टुकड़े टुकड़े करदो उनके जिस्म के
या जलाकर फेँकदो झाड़ियों में लाश उनकी

या जनता की अदालत में देदो मुकदमा उनका
और पीड़िता के माँ-बाप को बनादो जज वहां का

या फिर चौराहे में सूली पर
गुप्तांग से लटकादो उनको
या फिर गुप्तवास में चलादो गोली उनके

जो भी करो लेकिन ऐसी सज़ा जरूर दो उनको
ता जो फिर से कोई और ना बन जाये
नई निर्भया नई आसिफा या फिर प्रियंका रेड्डी

माफ़ करना आज कुछ अच्छे से लिख नहीं पाया
क्यूँकि मेरे हाथ कांप रहे हैं मेरी कलम कांप रही है
मेरा दिल कांप रहा है मेरी रूह कांप रही है
हर बार यह सोच कर मैं कांप उठता हूँ
कि क्यूँ नहीं कांपती ज़मीर उनकी
जब वो नोच रहे होते हैं कोमल मासूम से जिस्म
क्यूँ नहीं दिखती उनको तस्वीर उनकी
जो उनके अपने घर खेल रही हैं
कोई निर्भया कोई आसिफा या फिर प्रियंका रेड्डी ।।


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Sunday, 24 November 2019

SAINIK

A Tribute to our Soldiers who lost their lives in Siachen Avalanche

क्या बात करूँ अपने सैनिक वीरों की 
हर बार ही लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं 
ज़िक्र करूँ जो उनके बलिदानों का 
मेरे अपने फ़र्ज़ कम पड़ जाते हैं 
वो खड़े हैं जो देश की लकीरों पर 
तभी कागज़ की लकीरों पर गीत लिखो रहे हैं 
वो जाग रहे हैं तभी हम सो रहे हैं । 
वो जाग रहे हैं तभी हम सो रहे हैं ।।  

वो जिनकी सारी जवानी सरहद पर है 
जिनकी हर ईद - दिवाली सरहद पर है ,
वो जो इतना कुछ सहते हुए भी भर नहीं जाते 
वो जो साल साल भर अपने घर नहीं जाते ,
वो जिन्होंने अपने बच्चों के बढ़ते अरमान नहीं देखे 
वो जिन कईओं ने अपने माँ बाप के शमशान नहीं देखे ,
वो जो सर्दी-गर्मी, सुख-दुख अकेले सह रहे हैं 
फिर भी वंदे-मातरम हस कर कह रहे हैं ,
वो जिनके बटुए में बंद उनके प्यार हैं 
वो जो देश के लिए मरने-मारने को त्यार हैं ,
वो जिनकी बहादुरी - इस देश की निशानी है 
और जिनकी शहादत - अखबार के छठे पेज के
एक छोटे से कॉलम की कहानी है ,
वो जो चुप चाप सरहद पर अपना धर्म निभा रहे हैं 
और हम जैसे घर बैठे देश भक्ति के राग रो रहे हैं ,
वो जाग रहे हैं तभी हम सो रहे हैं । 
वो जाग रहे हैं तभी हम सो रहे हैं ।। 

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Thursday, 24 October 2019

RAAVAN

ਸੁਣ ਵੇ ਪਾਪੀ ਜ਼ਾਲਮਾ
ਮੂੰਹ ਤੋਂ ਰਾਮ ਤੇ ਮਨ ਦਿਆ ਰਾਵਣਾ
ਵੇ ਤੂੰ ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਖਾ ਲਈ ਆਪਣੀ
ਤੇ ਹੋਰ ਦੱਸ ਤੂੰ ਕੀ-ਕੀ ਖਾਵਣਾ,
ਸੁਣ ਵੇ ਪਾਪੀ ਜ਼ਾਲਮਾ
ਮੂੰਹ ਤੋਂ ਰਾਮ ਤੇ ਮਨ ਦਿਆ ਰਾਵਣਾ ।

ਵੇ ਤੂੰ ਸਾਰੇ ਖੇੜੇ ਖੋਰ ਕੇ ਖਾ ਗਿਆਂ
ਅੱਖੀਂ ਸੁਪਨੇ ਭੋਰ ਕੇ ਖਾ ਗਿਆਂ
ਹੱਥੀਂ ਲਾਏ ਗੀਤ ਤੂੰ ਆਪੇ ਛਾਂਗੇ
ਤੇ ਸਾਰੇ ਅਲਫਾਜ਼ ਤੋੜ ਕੇ ਖਾ ਗਿਆਂ,
ਵੇ ਤੂੰ ਡੀਕ ਲਾ ਕੇ ਪੀ ਗਿਆਂ ਸਾਰੀ ਕਾਲੀ ਸਿਆਹੀ
ਤੇ ਹੁਣ ਏਹਨਾਂ ਚਿੱਟੇ ਬੰਜਰ ਵਰਕਿਆਂ ਤੋਂ
ਅੱਖਰਾਂ ਦੀ ਪਿਉਂਦ ਵੇ ਕਿੱਥੋਂ ਚ੍ਹਾਹਵਣਾ,
ਸੁਣ ਵੇ ਪਾਪੀ ਜ਼ਾਲਮਾ
ਮੂੰਹ ਤੋਂ ਰਾਮ ਤੇ ਮਨ ਦਿਆ ਰਾਵਣਾ ।

ਵੇ ਤੂੰ ਆਪਣੀ ਵਿਆਹੀ ਆਪੇ ਖਾ ਲਈ
ਤੇ ਹੋਰ ਵੀ ਕਿੰਨੀਆਂ ਵਿਆਹੀਆਂ-ਕੁਆਰੀਆਂ ਖਾ ਗਿਆਂ
ਕੁੱਝ ਖਾਦੀਆਂ ਨੱਕੋਂ-ਕੰਨੋਂ ਸੁੰਨੀਆਂ
ਤੇ ਕੁੱਝ ਚਾਹਵਾਂ ਨਾਲ ਸ਼ਿੰਗਾਰੀਆਂ ਖਾ ਗਿਆਂ
ਵੇ ਤੂੰ ਰੂਹ ਖਾਦੀ ਤੂੰ ਜਿਸਮ ਖਾਦੇ ਤੂੰ ਕੁੱਖਾਂ ਖਾਦੀਆਂ
ਤੇ ਹੱਸਦੇ-ਵਸਦੇ ਵੇਹੜੇ ਦੀਆਂ ਕਿਲਕਾਰੀਆਂ ਖਾ ਗਿਆਂ,
ਵੇ ਤੂੰ ਪੱਕੀਆਂ ਨੀਂਹਾਂ ਮਿੱਟੀ ਕੀਤੀਆਂ
ਤੇ ਹੁਣ ਜਬਰ ਦੀਆਂ ਢੇਮਾਂ ਮਾਰ
ਕੱਚੇ ਢੱਠੇ ਕੋਠੇ ਕਾਥੋਂ ਢਾਹਵਣਾ,
ਸੁਣ ਵੇ ਪਾਪੀ ਜ਼ਾਲਮਾ
ਮੂੰਹ ਤੋਂ ਰਾਮ ਤੇ ਮਨ ਦਿਆ ਰਾਵਣਾ ।

ਵੇ ਤੂੰ ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਖਾ ਲਈ ਆਪਣੀ
ਤੇ ਹੋਰ ਦੱਸ ਤੂੰ ਕੀ-ਕੀ ਖਾਵਣਾ
ਸੁਣ ਵੇ ਪਾਪੀ ਜ਼ਾਲਮਾ
ਮੂੰਹ ਤੋਂ ਰਾਮ ਤੇ ਮਨ ਦਿਆ ਰਾਵਣਾ ।।

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Sun ve paapi zaalma
Munh ton Ram te mann ton Raavna
Ve tu sari zindagi kha lai apni
Te hor das tu ki ki khaavna
Sun ve paapi zaalma
Munh ton Ram te mann ton Raavna

Ve tu sare khede khor ke kha gya
Akhin supne bhor ke kha gya
Hathi`n laaye geet tu aap chhaange
Te sare alfaz tod ke kha gya
Ve tu deek la ke pee gya sari kaali siyahi
Te hun ehna chitte banjar varkyan ton
Akhran di piyond ve kithon chhahvna
Sun ve paapi zaalma
Munh ton Ram te mann ton Raavna ...

Ve tu apni viahi aape kha lai
Te hor vi kinian viahian-kuwarian kha gya
Kujh khadian nakkon-kannon sunnian
Te kujh chahwan naal shingarian kha gya
Ve tu rooh khadi tu jism khade tu kukh`an khadian
Te hasde-vasde vehre dian kilkarian kha gya
Ve tu pakkian neenhan mitti kitian
Te hun jabar dian dheman maar
Kache dhathe kothe kathon dhaahvna
Sun ve paapi zaalma
Munh ton Ram te mann ton Raavna ...

Ve tu sari zindagi kha lai apni
Te hor das tu ki ki khaavna
Sun ve paapi zaalma
Munh ton Ram te mann ton Raavna ...

Sunday, 29 September 2019

PUNJABI

ਸੰਗ-ਸ਼ਰਮ ਦੀ ਘੁੰਡ ਦੇ ਓਹਲੇ
ਅੱਖਰ ਮਾਰ `ਤੇ ਪੋਹਲੇ-ਪੋਹਲੇ 
ਵਲੈਤਣ ਸਿਖ ਲਈ ਸੋਹਲੇ-ਸੋਹਲੇ ,
`ਤੇ ਆਪਣੇ ਹੱਥੀਂ ਬੇਦਖ਼ਲ ਕਰ `ਤੀ 
ਜੋ ਮਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ,
ਹੁਣ ਭਾਵੇਂ ਮੈਂ ਬੋਲਦਾ ਨਹੀਂ 
ਪਰ ਉਂਝ ਜਮਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ।

ਖੁੱਲੇ ਵੇਹੜੇ ਤਾਰਿਆਂ ਦੀ ਛਾਂਵੇਂ 
ਡਾਹ ਵਾਣ ਦੇ ਮੰਜੇ ਥਾਂਵੋਂ-ਥਾਂਵੇਂ 
ਪਾ ਲੱਤ ਕੜਿੰਗੀ ਸਿਰ ਧਰ ਕੇ ਬਾਹਵੇਂ ,
ਸੌਣਾ ਸੁਣਕੇ ਮਾਂ ਤੋਂ ਮਿੱਠੀ ਜੇਹੀ ਲੋਰੀ 
ਉਹ ਹਰ ਰਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ,
ਹੁਣ ਭਾਵੇਂ ਮੈਂ ਬੋਲਦਾ ਨਹੀਂ 
ਪਰ ਉਂਝ ਜਮਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ।

ਇੱਕ ਨਾਲ ਸੀ ਪੜਦੀ ਜੋ ਲਾਗਲੇ ਪਿੰਡ ਦੀ 
ਕੱਚੀ ਡੰਡੀ `ਤੇ ਜਾਂਦੀ ਸੀ ਮਹਿਕਾਂ ਵੰਡਦੀ 
ਤਿੱਖੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਹਿੱਕ ਸੀ ਚੰਡਦੀ ,
ਜੇਹਦੀ ਬਾਂਹ ਫੜੀ ਸੀ ਜੱਟ ਦੇ ਮੂਸਲ ਓਹਲੇ 
ਉਹ ਪਹਿਲੀ ਮੁਲਾਕਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ,
ਹੁਣ ਭਾਵੇਂ ਮੈਂ ਬੋਲਦਾ ਨਹੀਂ 
ਪਰ ਉਂਝ ਜਮਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ।

ਜਦ ਹੌਂਸਲੇ ਗ਼ਰੀਬੀ ਮੂਹਰੇ ਹਾਰ ਥੱਕੇ ਸੀ 
ਨਿਕਲੇ ਪਿੰਡੋਂ ਮੋਢਿਆਂ ਉੱਤੇ ਭਾਰ ਚੱਕੇ ਸੀ 
ਆ ਵੱਡੇ ਸ਼ਹਿਰਾਂ ਦੇ ਵਿੱਚ ਖਾਦੇ ਧੱਕੇ ਸੀ ,
ਜੋ ਸ਼ਾਹ ਤੋਂ ਚੱਕ ਪਾਈ ਸੀ ਵਿੱਚ ਬੋਝੇ ਦੇ 
ਉਹ ਭਾਗਾਂ ਵਾਲੀ ਖੈਰਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ,
ਹੁਣ ਭਾਵੇਂ ਮੈਂ ਬੋਲਦਾ ਨਹੀਂ 
ਪਰ ਉਂਝ ਜਮਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ।

ਹੁਣ ਪੂਰਾ "ਓ ਅ" ਕਿੱਥੇ ਆਵੇ 
"ਗ ਘ", "ਜ ਝ" ਜਾਨ ਫ਼ਸਾਵੇ 
"ਢ ੜ" ਤਾਂ ਗਲ਼ ਵਿੱਚ ਹੀ ਅੜਦਾ ਜਾਵੇ ,
ਹੁਣ ਤਾਂ 'ਛੱਬੀ ਅੱਖਰੀ' ਮਾਰ ਗਈ "ਪੈਂਤੀ" ਨੂੰ  
ਪਰ ਪਹਿਲਾਂ ਸਾਰੀ ਗੱਲਬਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ,
ਹੁਣ ਭਾਵੇਂ ਮੈਂ ਬੋਲਦਾ ਨਹੀਂ 
ਪਰ ਉਂਝ ਜਮਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ । 
ਹੁਣ ਭਾਵੇਂ ਮੈਂ ਬੋਲਦਾ ਨਹੀਂ 
ਪਰ ਉਂਝ ਜਮਾਤ ਮੇਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਸੀ ।। 

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Friday, 27 September 2019

KYA LIKHUN MAIN

लिखने बैठूँ तो समझ ना आए क्या लिखूँ मैं ,

तेरी महफ़िल की शहनाई लिखूँ या अपनी महफ़िल की तन्हाई लिखूँ मैं ,
उम्र भर जो तू करता रहा इस जोकर से , वो वफ़ा लिखूँ या,
उस एक पल की बेवफ़ाई  लिखूँ मैं ,
होते देख बेगाना मुँह से निकली दुआ लिखूँ या दिल से निकली आह लिखूँ मैं।
लिखने बैठूँ तो समझ ना आए क्या लिखूँ मैं।

उस खुदा की कुदरत लिखूँ या इन्सान की फितरत लिखूँ मैं ,
जिसके बह गए सब ख्वाब पसीने में , उस गरीब की मेहनत लिखूँ या ,
किसी रईस बाप के बेटे की किस्मत लिखूँ मैं ,
अब बताओ उस की रहमत लिखूँ या फिर बेइन्साफ़ सज़ा लिखूँ मैं।
लिखने बैठूँ तो समझ ना आए क्या लिखूँ मैं।

देश में अर्थ-व्यवस्था की मार लिखूँ या विदेशी दौरे पर सरकार लिखूँ मैं ,
सड़क के इस ओर चलता कर-मुक्त योग का व्यापार लिखूँ या ,
उस पार मज़बूरी में चलता लाल बाज़ार लिखूँ मैं ,
अब पैकेट बंद पत्तियों का दाम लिखूँ या नंगे जिस्मों का भाव लिखूँ मैं।
लिखने बैठूँ तो समझ ना आए क्या लिखूँ मैं।

उसके नाम पर एक पैगाम लिखूँ या यह ख़त यूँही बेनाम लिखूँ मैं ,
ऐसे ही लिखदूँ मौसम का हाल उसे या
हाल-ए-दिल ब्यान करते उसके इश्क़ का अंजाम लिखूँ  मैं ,
उसपे लिखूँ उसका नाम और घर का पता या कब्रिस्तान में सरु के पेड़ का निशान लिखूँ मैं।
लिखने बैठूँ तो समझ ना आए क्या लिखूँ मैं।
इस काफ़िर दिल की ज़ुबान लिखूँ या आस्तिक दुनिया की दास्तान लिखूँ मैं।
लिखने बैठूँ तो समझ ना आए क्या लिखूँ मैं । ।

Likhne bethu to samaz na aaye kya likhun main ,

Teri mehfil ki shahnai likhun ya apni mehfil ki tanhai likhun main ,
Umar bhar jo tu karta rha is Joker se , wo wafa likhun ya ,
Us ek pal ki bewafai likhun main ,
Hote dekh begana muh se nikli dua likhun ya dil se nikli aah likhun main ..
Likhne bethu to samaz na aaye kya likhun main ...

Us khuda ki kudrat likhun ya insan ki fitrat likhun main ,
Jiske beh gye sab khwaab paseene mein , us gareeb ki mehnat likhun ya ,
Kisi raees baap ke bete ki kismat likhun main ,
Ab btao uski rehmat likhun ya fir beinsaf saza likhun main ..
Likhne bethu to samaz na aaye kya likhun main ...

Desh mein arth-vyavstha ki maar likhun ya videshi daure par sarkar likhun main ,
Sadak ke is aur chalta kar-mukt yog ka vyapar likhun ya ,
Us paar majburi mein chalta laal bazar likhun main ,
Ab packet band pattiyon ka daam likhun ya nange jismon ka bhaav likhun main ..
Likhne bethu to samaz na aaye kya likhun main ...

Uske naam par ek paigam likhun ya yeh khat yunhi benaam likhun main ,
Aise hi likhdun mausam ka haal use ya ,
Haal-e-dil byan karte uske ishq ka anjaam likhun main ,
Uspe likhun uska naam aur ghar ka pata ya kabirstan mein saru ke pedh ka nishan likhun main ..
Likhne bethu to samaz na aaye kya likhun main ...
Is kafir dil ki zubaan likhun ya aastik dunia ki daastan likhun main ..
Likhne bethu to samaz na aaye kya likhun main ...