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Saturday, 12 May 2018

AAFTAAB

कुछ और दिखा ही ना उसके सिवा ,
जब से वो एक आफ़ताब देखा है ,
दिन में सो रहे हैं रातों को जग रहे हैं ,
इल्म नहीं कि ख़्वाब में हकीक़त,
या फिर हकीक़त में ख्वाब देखा है।
दो आँखें देखीं हैं , आँखों में शबाब देखा है ,
सुना है नैन-ओ-नक्स भी बड़े तेज़ हैं उनके ,
हमने तो जब भी देखा है , चेहरे पर नक़ाब देखा है।

किताबों में अक्सर रखा हुआ गुलाब देखा है ,
यह पहली दफ़ा है कि,
गुलाब को हाथ में लिए किताब देखा है।
मुसल्सल सा हो गया अब तो देखना उनको ,
लेकिन दिल की बेबसी का आलम तो पूछो ,
उनको निगाहें छुपाते जो जनाब देखा है।

दूर से तो हमने उनको बेहिसाब देखा है ,
एक दिन देखा जो पास जा के ,
जैसे क़िब्ले का कोई मेहराब देखा है।
पूछ ही लिया हिम्मत जुटा के ,
कि हमने तो तुमको देखा है ऐसे,
जैसे आंखें बंद करके कोई शिहाब देखा है।

लेकिन आपने हम में ऐसा भी क्या खराब  देखा है ,
जो आज तक कभी ना हमारा ,
सर झुका के किया हुआ आदाब देखा है।
ख़ामोश खड़ा रहा वो बोला कुछ ना ,
लेकिन उसकी चुप्पी में मैंने जवाब देखा है ,
जो चमकती थी शब्-ताब की तरह
उन आँखों में ख़ौफ़ का सैलाब देखा है।

जैसे ही हटाया महताब से पर्दा उसने ,
एक रुख पर गिरा हुआ तेज़ाब देखा है।
पत्थर  सुन्न हो गया वहीँ पर ,
खुदा के हुस्न को मिला दुनिया का खिताब देखा है।
वो दिन गया सौ दिन गए ,
ना वो आँखें देखीं हैं ना ही वो नक़ाब देखा है ,
लेकिन उसके सिवा अब देखा ही कुछ ना ,
जब से वो एक झुलसा हुआ आफताब देखा है।
जब से वो एक झुलसा हुआ आफताब देखा है।।

# आफताब = Sun
# मुसल्सल = Continous
# शिहाब    =  Burning Star
# शब्-ताब  = Fire Fly
# महताब   = Moon Light


1 comment:

Thanks for your valuable time and support. (Arun Badgal)