HAWA KE SAYE

कोई पूछे तो क्या बताएँ ,
समझाना चाहें भी तो क्या समझाएँ ,
अगर फिर भी ज़िद है तो इतना समझ लो कि ,
खुद को बंद कमरे में कैद करके घर से निकल आये ,
ग़मों की धुंद में ढूंढ़ने हम उड़ती हवा के साये।

यह हवा अब जब भी चलती है तो ख़ाक उड़ा देती है ,
किसी किसान के खेत में बची राख उड़ा देती है ,
जो चुबती है आँखों में और निग़ाह ग़हरी कर देती है ,
जो चंद पलों में खुले गाँव की हवा शहरी कर देती है ,
जो पेड़ों को लहराती नहीं है , परिंदो को फड़फड़ाती नहीं है ,
जो सुन्न सी हो जाती है शमशान की तरह ,
छोटे बच्चों के संग मिल गाती नहीं है ,
अब कौन लोरी सुनाये , कौन चैन की नींद सुलाये ,
कौन ढूंढ के दिखाए इन नादान रूहों को ,
ग़मों की धुंद में उड़ती हवा के साये।

पर यह हवा पहले कुछ ऐसी तो ना थी ,
मान लेती थी हर बात मेरी ,
यूँ मन-मर्ज़ी से बहती तो ना थी ,
पर फिर न-जाने कब यह शोर चला ,
एक न-शुक्रा सा दौर चला , मुँह मोड़ चला ,
मैं जितना इसकी और चला यह उतना पीछे छोड़ चला ,
एक गूँगी-बहरी सी सड़क थी एक काली-आंधी दौड़ चला ,
जो राह में आये वो दिखे ना ,
जो संग चले थे उनको राहों में ही छोड़ चला ,
अब कौन रास्ते जोड़ के लाये , बीते लम्हें मोड़ के लाये ,
अब जब ज़मीन ही रही ना क़दमों के नीचे ,
घनी धूप में भी ना दिखेंगे उड़ती हवा के साये ।।



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