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Thursday, 14 January 2016

ZINDAGI

अपनी ज़िन्दगी को बयान करने के लिए कुझ अल्फ़ाज़ जुटा रहा था तो यह फ़लसफ़ा निकला अपनी ज़िन्दगी का।

कभी अपनी एक दुनिया में रहते थे ,
सब कुझ पाने की हसरत थी।
दुनिया की परवाह ना कोई ,
सपनों से किसे फुरसत  थी।
आंसुओं से कोई वास्ता ना था ,
हसना हमारी फितरत थी।
पर अब यह ज़िन्दगी बदल गई ,यह दुनिया बदल गई ,
ना दुनिया का कोई कोना अच्छा लगता है।
इस कदर ज़िन्दगी ने बदला हमें ,
हसी खो गई कहीं अब तो बस रोना अच्छा लगता है ,
सब कुझ खोना अच्छा लगता है। 

2 comments:

  1. Very well said, Mr.Arun...
    Zindagi to hai lekin usme zindadilli Ni...

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  2. U really write our alfaaz for life, so perfectly worded, carry on!!!

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Thanks for your valuable time and support. (Arun Badgal)