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Sunday, 14 October 2018

MANN

आज कुछ लिखने का मन तो है
लेकिन अल्फ़ाज़ नहीं है ,
महफ़िल भी है अंदाज़ भी है
लेकिन मिज़ाज़ नहीं है ,
आज कुछ लिखने का मन तो है
लेकिन अल्फ़ाज़ नहीं है।

मन तो है कि लिखदूँ आज एक गीत
जिसे गुनगुनाता रहूँ मैं तमाम उम्र ,
उसकी तर्ज़ भी है साज़ भी है
लेकिन आवाज़ नहीं है ,
आज कुछ लिखने का मन तो है
लेकिन अल्फ़ाज़ नहीं है।

मन तो है कि लिखदूँ वो सारे टूटे सपने
जिनके तिन्के फसे हैं अभी भी आँखों में कहीं ,
आज भी वो ख्वाब तो है ख्याल भी है
लेकिन आस नहीं है ,
आज कुछ लिखने का मन तो है
लेकिन अल्फ़ाज़ नहीं है।

मन तो है कि लिखदूँ वो रिश्ते सारे
जो निभा कर भी बने नहीं जो बन कर भी निभे नहीं ,
वो लिखना जरूरी भी है मजबूरी भी है
लेकिन रिवाज़ नहीं है ,
आज कुछ लिखने का मन तो है
लेकिन अल्फ़ाज़ नहीं है।

मन तो है कि लिखदूँ आज मन ही अपना
जो छुपा रहा आज तक मन ही मन में कहीं ,
जिसमें कुछ चेहरे भी हैं कुछ नाम भी हैं
लेकिन अब ज़ज़्बात नहीं है ,
आज कुछ लिखने का मन तो है
लेकिन अल्फ़ाज़ नहीं है ।।

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