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Saturday, 8 September 2018

MERA SHEHAR

आज तक यह घर था मेरा , पहचान थी मेरी ,
चंद चौराहे और कुछ गलियां इसकी
जिनपे दौड़ा करती थी हर ख्वाहिश ,
हर उम्मीद मेरी , हर सपना मेरा
जो चला गया कहीं तेरे क़दमों के संग ,
अब जैसे रूठ सा गया है मेरा शहर ....

जिनपे भागा चला आता था कभी
तेरे शहर को , अब यहाँ के रास्ते
कहीं जाते नहीं हैं , कहीं से भी आते नहीं हैं ,
ख़ुद में ही समा जाता है हर मोड़ यहाँ का ,
अब जैसे टूट सा गया है मेरा शहर ।
अब जैसे टूट सा गया है मेरा शहर ।।

जो कभी महका करती थी चमेली की
खुशबू की तरह , अब रुक सी गयी हैं
यहाँ की हवाएँ , हर पत्ता अब शाख़ से टूट कर
सीधा ज़मीन पर गिर जाता है , किसी को भी
एक झोंका तक नसीब नहीं होता ,
अब जैसे थम सा गया है मेरा शहर ....

अब भी हर रोज़ यहाँ सूरज तो निकलता है ,
लेकिन रौशनी नहीं होती , हर किरण इसकी
जो धरती से टकरा के समा जाती थी
मुझमें ही कहीं , अब उनमें भी वो ताप ना रहा ,
अब जैसे नम सा गया है मेरा शहर ।
अब जैसे नम सा गया है मेरा शहर  ।।

सच बताऊँ तो रौनकें चली गई हैं , हर ख़ुशी
चली गयी है यहाँ की , अब बस एक
शोर सा रह गया है , बेज़ोर  सा रह गया है ,
इस बार की होली भी बेरंग सी मनाई है हमने ,
त्योहारों में भी एक गुबार सा रह गया है ,
अब जैसे उजड़ सा गया है मेरा शहर ....

अब पता नहीं मैं शहर सा हो गया हूँ , या यह
शहर मुझसा हो गया है , यह पत्थर का टुकड़ा
रह गया है और मैं पत्थर का पुतला रह गया हूँ ,
ना इसकी राहें चलती हैं ना मेरी सांसें चलती हैं ,
अब जैसे मर सा गया है मेरा शहर ।
अब जैसे मर सा गया है मेरा शहर ।।

TERA SHEHAR

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