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Tuesday, 29 August 2017

BALATKAAR

हर बार जब भी अंधविश्वास में अँधे लोगों द्धारा किसी इंसान को भगवान् कहते सुनता हूँ तो बड़ी हैरानी होती है और फिर उसी भगवान् पर कोई इल्ज़ाम सुनता हूँ तो ज़्यादा हैरानी होती है।  लेकिन सबसे बड़ी हैरानी तब होती है जब अँधे लोग अपने बलात्कारी भगवान् को बचाने के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं। इस बार भी वही सब हुआ और इस बार अपने ज़ेहन में उठे उभालों को किसी एक मासूम लड़की की नज़र से समझने और लिखने की कोशिश की है। उमीद है आप सबके ज़ेहन में मेरी सोच पहुँच पायेगी।


सिर्फ कपड़े फाड़ के या ज़मीन पे लिटा के ,
हाथ-पैर बाँध के या मुँह में कपड़ा घुसा के ,
सिर्फ जिस्म नोच के या अंग लताड़ के बलात्कार नहीं होता ,
हर रोज़ इन हवस भरी नज़रों की ताड़ से मेरा बलात्कार होता है।
हर रोज़ इंसानों के हाथों इंसानियत की मार से मेरा बलात्कार होता है।

सिर्फ गैर मर्दों से या गली के गुंडों से ,
अनजान बे-दर्दों से या ज़ालिम दरिंदों से ,
सिर्फ बे-इल्म बाशिंदों से या बे-तालीम दहशतगर्दों से बलात्कार नहीं होता ,
हर रोज़ शाम को गोद में बिठाके अंकल के प्यार से मेरा बलात्कार होता है।
हर रोज़ इंसानों के हाथों इंसानियत की मार से मेरा बलात्कार होता है।

सिर्फ रात के अँधेरे में या घने साये में ,
किसी खुफ़िआ हवेली में या किसी सुनसान राहे में ,
सिर्फ जबर की आहट में या खौफ़ शाये में बलात्कार नहीं होता ,
हर रोज़ किसी बड़े अफसर से मिली शाबाशी की आड़ में मेरा बलात्कार होता है।
हर रोज़ इंसानों के हाथों इंसानियत की मार से मेरा बलात्कार होता है।

सिर्फ ज़मीरों के क़ातलों से या जिस्म के दुकानदारों से ,
नशे में धुत किसी एक दो या तीन चार खुंखारों से ,
सिर्फ ज़मींदारों, नायबदारों या धर्म के ठेकेदारों से बलात्कार नहीं होता ,
हर बार किसी बलात्कारी को बचाने के लिए जुड़ी अंधी अवाम से मेरा बलात्कार होता है।
हर रोज़ इंसानों के हाथों इंसानियत की मार से मेरा बलात्कार होता है।

( Sirf kapde faad ke ya zameen pe lita ke ,
  Hath paer baandh ke ya munh mein kapda ghusa ke,
  Sirf jism noch ke ya ang lataad ke balatkaar nahi hota ,
  Har roz in hawas bhari nazron ki taad se mera balatkaar hota hai .
  Har roz insaanon ke haathon insaaniyat ki maar se mera balatkaar hota hai ..

  Sirf gair mardon se ya gali ke gundon se,
  Anjaan be-dardon se ya zalim darindon se ,
  Sirf be-ilam bashindon se ya be-taleem dehshatgardon se balatkaar nahi hota ,
  Har roz sham ko god mein bithake uncle ke pyar se mera balatkaar hota hai .
  Har roz insaanon ke haathon insaaniyat ki maar se mera balatkaar hota hai ..

  Sirf raat ke andhere mein ya ghane saaye mein ,
  Kisi khufia haweli mein ya kisi sunsaan raahe mein ,
  Sirf jabar ki aahat mein ya khauf shaaye mein balatkaar nahi hota ,
  Har roz kisi bade officer se mili shabashi ki aad mein mera balatkaar hota hai .
  Har roz insaanon ke haathon insaaniyat ki maar se mera balatkaar hota hai ..

  Sirf zameeron ke qaatlon se ya jism ke dukaandaron se ,
  Nashe mein dhut kisi ek do ya teen chaar khunkharon se ,
  Sirf zameendaron , nayabdaaron ya dharam ke thekedaaron se balatkaar nahi hota ,
  Har baar kisi balatkaari ko bachane ke liye judi andhi awaam se mera balatkaar hota hai .
  Har roz insaanon ke haathon insaaniyat ki maar se mera balatkaar hota hai ... )

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Thanks for your valuable time and support. (Arun Badgal)