Amazon

Sunday, 16 July 2017

SAFAR - 2

आज अपनी कुछ पुरानी किताबों में बंद कुछ काले किये हुए कागज़ देख रहा था ,  उनमें से एक ख़्याल, जो कि मेरे दिल के काफ़ी करीब है , आपकी नज़र कर रहा हूँ।

ना मन्ज़िलों का पता है , ना रास्तों की ख़बर ,
फिर भी चलता जा रहा हूँ ,
पल दो पल का साथ और फिर ज़िन्दगी भर का सबर ,
फिर भी चलता जा रहा हूँ ,
उनकी हर साँसों की कदर , पर वो मेरे ज़ज़्बातों से बेख़बर ,
फिर भी चलता जा रहा हूँ ,
जानता हूँ इस ओर ना उसका घर, इस रास्ते के अंत पर मिलेगी कबर ,
फिर भी चलता जा रहा हूँ ,    
एक प्यास के साथ, एक एहसास के साथ, 
कि कभी तो मिलेंगे वो एक आस के साथ ,
चलता जा रहा हूँ , बस चलता ही जा रहा हूँ ,
और यूँ ही चलता रहेगा यह सफर , जब तक मिल ना जाएं , 
तुम हमें , या फिर हम इस ख़ाक में ,
चलता जा रहा हूँ , बस चलता ही जा रहा हूँ। 

( Na manzilon ka pta hai, na raaston ki khabar ,
  Phir bhi chalta ja rha hu , 
  Pal do pal ka sath aur phir zindagi bhar ka sabar ,
  Phir bhi chalta ja rha hu , 
  Unki har saanson ki kadar , par wo mere zazbaaton se bekhabar ,
  Phir bhi chalta ja rha hu , 
  Jaanta hu is aur na uska ghar, is raaste k ant par milegi kabar ,
  Phir bhi chalta ja rha hu , 
  Ek pyaas k sath, ek ehsaas k sath ,
  Ki kbi to milege wo ek aas k sath ,
  Chalta ja rha hu , Bas chalta hi ja rha rha hu ,
  Aur yun hi chalta rhega yeh safar , jab tak mil na jaye ,
  Tum humein , ya phir hum is khaak mein ,
  Chalta ja rha hu , Bas chalta hi ja rha rha hu .... )

https://youtu.be/SI3hbpdmIqA

No comments:

Post a Comment

Thanks for your valuable time and support. (Arun Badgal)