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Tuesday, 25 August 2015

IKRAAR

यह कुछ लाईनें एक उस शख़्स के लिए , एक उस सोच के लिए , जो अगर मेरी ज़िन्दगी में ना आता तो शायद आज मैं किसी काबिल ना होता।

हर इनकार में इकरार ढूंढ़ता हूँ ,
उसकी बेरूखी में भी प्यार ढूंढ़ता हूँ ,
हसते देख उसे ग़ैरों के संग ,
अपनी तनहाई में भी बहार ढूंढ़ता हूँ।
हर इनकार में इकरार ढूंढ़ता हूँ ,
उसकी बेरूखी में भी प्यार ढूंढ़ता हूँ।

ना दौलत थी ना शौहरत थी ,
एक हस्ती थी छोटी सी ,
एक आस है सपने संजोती सी ,
जिस में उसका आधार ढूंढ़ता हूँ ,
हर इनकार में इकरार ढूंढ़ता हूँ ,
उसकी बेरूखी में भी प्यार ढूंढ़ता हूँ।

ग़ैरों से तालुख कहाँ था , अपनों से भी रुसवा दिआ ,
तुम्हें इस क़दर अपना बैठे ,कि खुद को खुद से जुदा किआ ,
अब तो हैं मुझमें तेरी यादें, तेरा अक्स, तेरा एहसास ,
जिसमें मुक़मल संसार ढूंढ़ता हूँ ,
हर इनकार में इकरार ढूंढ़ता हूँ ,
उसकी बेरूखी में भी प्यार ढूंढ़ता हूँ ,
हसते देख उसे ग़ैरों के संग ,
अपनी तनहाई में भी बहार ढूंढ़ता हूँ।
हर इनकार में इकरार ढूंढ़ता हूँ ,
उसकी बेरूखी में भी प्यार ढूंढ़ता हूँ।

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